साहित्य एक नज़र - कोलकाता ,अंक- 1424 , वर्ष - 3 , चैत्र शुक्ल 03 संवत 2082 , मंगलवार , 01 अप्रैल 2025 , मो - 6290640716 ,संपादक - रोशन कुमार झा , कविता - 34(16) 🌅🇮🇳 , 51 दिन पर , पिछले बार भी 60 दिन पर, अहमदाबाद, गुजरात एयरपोर्ट (2081) कोलकाता ( 11 मई 2021 - 11 मई 2024 = 3 वर्ष )
साहित्य एक नज़र - कोलकाता ,अंक- 1424 , वर्ष - 3 , चैत्र शुक्ल 03 संवत 2082 , मंगलवार , 01 अप्रैल 2025 , मो - 6290640716 ,संपादक - रोशन कुमार झा , कविता - 34(16) 🌅🇮🇳 , 51 दिन पर , पिछले बार भी 60 दिन पर, अहमदाबाद, गुजरात एयरपोर्ट (2081) कोलकाता ( 11 मई 2021 - 11 मई 2024 = 3 वर्ष )
साहित्य एक नज़र - कोलकाता ,अंक- 1424 , वर्ष - 3 , चैत्र शुक्ल 03 संवत 2082 , मंगलवार , 01 अप्रैल 2025 , मो - 6290640716 ,संपादक - रोशन कुमार झा , कविता - 34(16) 🌅🇮🇳 , 51 दिन पर , पिछले बार भी 60 दिन पर, अहमदाबाद, गुजरात एयरपोर्ट (2081) कोलकाता ( 11 मई 2021 - 11 मई 2024 = 3 वर्ष )
साहित्य एक नज़र - कोलकाता ,अंक- 1424 , वर्ष - 3 , चैत्र शुक्ल 03 संवत 2082 , मंगलवार , 01 अप्रैल 2025 , मो - 6290640716 ,संपादक - रोशन कुमार झा , कविता - 34(16) 🌅🇮🇳 , 51 दिन पर , पिछले बार भी 60 दिन पर, अहमदाबाद, गुजरात एयरपोर्ट (2081) कोलकाता ( 11 मई 2021 - 11 मई 2024 = 3 वर्ष )
साहित्य एक नज़र - कोलकाता ,अंक- 1424 , वर्ष - 3 , चैत्र शुक्ल 03 संवत 2082 , मंगलवार , 01 अप्रैल 2025 , मो - 6290640716 ,संपादक - रोशन कुमार झा , कविता - 34(16) 🌅🇮🇳 , 51 दिन पर , पिछले बार भी 60 दिन पर, अहमदाबाद, गुजरात एयरपोर्ट (2081) कोलकाता ( 11 मई 2021 - 11 मई 2024 = 3 वर्ष )
हम हिन्दुस्तानी , USA (18 April 24 April 2025)
https://humhindustaniusa.com/epaper/edition/415/18042025/page/53
https://youtu.be/kvC__3RELhI?si=5u7K_lRv1_VIxTuo
USA से प्रकाशित होने वाली पत्रिका में अपनी कविता छपी है - "कभी मैं भी छपता था " ,
लगभग पाँच साल बाद कविता छपने के लिए भेजें थे
, इस माह दो पत्रिका में छप गई । अभी भी दम है अपनी कलम ✍️ में ।
कोलफील्ड मिरर 09 अप्रैल 2025
coalfieldmirrorbn@gmail.com
website- coalfieldmirror.com
www.youtube.com/@coalfieldmirror2786
https://whatsapp.com/channel/0029Vay5XYk4IBhAwA2OPT10
https://www.digitalpaper.in/view/13766/coalfield-mirror/6
कविता -
कभी मैं भी छपता था -
✍️ रोशन कुमार झा
08 अप्रैल 2025 , मंगलवार
अंक - 1424 , कविता - 34(16)
कविता -
कभी मैं भी छपता था -
कभी तुम्हारे कारण छपते थे ,
कभी तुम्हारे कारण छपते थे ,
कब ? जब तुम से हम पटे थे ।
और आज तुम से छिपता हूँ ,
क्योंकि आज मैं भी
किसी और से पटा हूँ ।।
कभी तुम्हारे पर कुछ लिखते थे ,
कब ? जब तुमसे हम लिपटे थे ।
ब्रेकअप हुआ -
अलग हुए ,
फिर छोड़ दिया अपना शहर ,
कैसे भुलाऊं -
तुम्हारे साथ बीताये हुए वह पल ।
अब समझ में आया -
तुम मंज़िल नहीं मेरी राह थी ,
मेरी चाह तुम , कोई और तुम्हारी चाह थी ।
खुद से ज़्यादा तुम्हारी परवाह थी ,
तुम्हें भी चोट पहुँचा होगा -
जब मेरी विवाह थी ।।
अब छपने की इच्छा है
पर छपने से डरता हूँ ,
कुछ हमारे भी सपने थे न
बस
उसे ही पूरा करता हूँ ।।
✍️ रोशन कुमार झा
अहमदाबाद , गुजरात